ब्रिटिश काल में धानका जनजाति : वनवासियों से खेतिहर मजदूर तक ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, 'धानका' समुदाय को पहली बार एक विशिष्ट आदिवासी समूह के रूप में आधिकारिक तौर पर दस्तावेजों में दर्ज किया गया था। 1880 के दशक के 'बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गजेटियर' और राजपूताना एजेंसी के औपनिवेशिक रिकॉर्ड में धानका जनजाति का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। अंग्रेज अधिकारियों ने इन्हें मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों के पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों के मूल निवासियों के रूप में चिन्हित किया: रेवा कांठा (गुजरात) खानदेश (महाराष्ट्र) राजपूताना (राजस्थान) उत्पत्ति एवं मूल पहचान ब्रिटिश मानवविज्ञानियों (anthropologists) के दस्तावेजों के अनुसार, "धानका" शब्द की उत्पत्ति 'धनुष' से हुई है। यह इस बात का प्रतीक है कि इस जनजाति के पूर्वज कुशल तीरंदाज, शिकारी और जंगलों में रहने वाले स्वतंत्र लोग थे। सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन एवं प्रभाव ब्रिटिश शासनकाल धानका जनजाति के लिए भारी सामाजिक-आर्थिक उथल-पुथल का समय साबित हुआ। अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए कठोर वन कानूनों और नई राजस्व प्रणालियों ने इस समुदाय के पारंपरिक अधिकारों को छीन लिया तथा उनके पैतृक जंगलों में उनके प्रवेश को सीमित कर दिया। शिकार और वनों पर निर्भरता खत्म होने के कारण, धानका समुदाय को अपने स्वतंत्र जीवन को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। जीविका चलाने के लिए इस समुदाय के लोगों को बड़े जमींदारों के खेतों में खेतिहर मजदूर के रूप में काम करना पड़ा। कालखंड / पहलू : औपनिवेशिक काल से पूर्व, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल प्राकृतिक आवास: स्वतंत्र वन क्षेत्र और पहाड़ी अंचल वन कानूनों द्वारा प्रतिबंधित सीमाएं मुख्य जीविका : वनों पर निर्भरता, शिकार व तीरंदाजी खेतिहर मजदूरी आधिकारिक पहचान : पारंपरिक जनजातीय समुदाय, 1931 की जनगणना में सूचीबद्ध स्वतंत्र जनजाति जनगणना में आधिकारिक सूचीकरण : 1931 की भारत की जनगणना (Census of India) तक आते-आते, ब्रिटिश प्रशासन ने अपनी जनसांख्यिकी में धानका को एक स्वतंत्र और स्पष्ट जनजातीय पहचान के रूप में पूरी तरह से सूचीबद्ध कर लिया था।

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